Govinda Career Downfall: 90s के सुपरस्टार की पूरी कहानी
Govinda के करियर में बदलाव कैसे आए? 90s के सुपरस्टार की पूरी कहानी
बॉलीवुड में कुछ अभिनेता ऐसे होते हैं, जिनकी फिल्मों के डायलॉग, डांस और कॉमेडी दर्शकों को सालों तक याद रहते हैं। गोविंदा भी उन्हीं अभिनेताओं में से एक हैं। 1990 के दशक में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी कॉमिक टाइमिंग, शानदार डांस और अलग अंदाज ने उन्हें दर्शकों के बीच लोकप्रिय बनाया। लेकिन एक समय ऐसा भी आया, जब उनकी फिल्मों की मौजूदगी पहले जैसी नहीं रही।
आखिर ऐसा क्या हुआ कि कभी लगातार हिट फिल्में देने वाले गोविंदा का करियर धीरे-धीरे बदलने लगा? क्या इसके पीछे फिल्मों का चयन था, बदलता हुआ बॉलीवुड था या समय के साथ दर्शकों की पसंद में आया बदलाव? आइए, गोविंदा के करियर के अलग-अलग पड़ावों को समझते हैं।
गोविंदा ने बॉलीवुड में अपने करियर की शुरुआत कैसे की?
गोविंदा का जन्म 21 दिसंबर 1963 को मुंबई में हुआ था। उनका पूरा नाम गोविंद अरुण आहूजा है। उनका परिवार फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ा हुआ था। उनके पिता अरुण कुमार आहूजा अभिनेता थे, जबकि उनकी मां निर्मला देवी एक गायिका और अभिनेत्री थीं।
फिल्मों में आने के बाद गोविंदा ने शुरुआत में अलग-अलग तरह की भूमिकाओं में काम किया। साल 1986 में रिलीज हुई फिल्म 'इल्जाम' से उन्हें पहचान मिली। इसी साल उनकी फिल्म 'लव 86' भी रिलीज हुई और उन्हें युवा दर्शकों के बीच लोकप्रियता मिलने लगी।
शुरुआती दौर में गोविंदा ने यह दिखा दिया कि वह सिर्फ अभिनय ही नहीं, बल्कि डांस और मनोरंजन के मामले में भी अपनी अलग पहचान बना सकते हैं।
90 के दशक में गोविंदा कैसे बने सुपरस्टार?
1990 का दशक गोविंदा के करियर का बेहद महत्वपूर्ण दौर माना जाता है। इस समय उन्होंने रोमांस, एक्शन, पारिवारिक मनोरंजन और कॉमेडी जैसी अलग-अलग शैलियों की फिल्मों में काम किया।
'शोला और शबनम', 'आंखें', 'राजा बाबू', 'कुली नंबर 1', 'हीरो नंबर 1' और 'दुल्हे राजा' जैसी फिल्मों ने उनकी लोकप्रियता को मजबूत किया।
गोविंदा की सबसे बड़ी खूबियों में से एक उनकी कॉमिक टाइमिंग थी। वह अपने चेहरे के हाव-भाव, बोलने के अंदाज और शारीरिक अभिनय से साधारण से दृश्य को भी मनोरंजक बना देते थे। उनका डांस भी उस दौर के दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ।
निर्देशक डेविड धवन के साथ उनकी जोड़ी ने कई सफल कॉमेडी फिल्मों में काम किया। दोनों की फिल्मों में तेज रफ्तार कहानी, गलतफहमियों से पैदा होने वाली कॉमेडी और यादगार किरदार देखने को मिलते थे।
इस दौर में गोविंदा की एक ऐसी स्क्रीन इमेज बनी, जिसमें दर्शक उनसे मनोरंजन, कॉमेडी और डांस की उम्मीद करते थे।
डेविड धवन के साथ जोड़ी ने करियर को कैसे बदला?
गोविंदा और डेविड धवन की जोड़ी 90 के दशक की हिंदी कॉमेडी फिल्मों के लिए खास रही। दोनों ने कई ऐसी फिल्में दीं, जिन्हें आज भी टीवी और दूसरे माध्यमों पर दर्शक पसंद करते हैं।
'कुली नंबर 1', 'हीरो नंबर 1', 'साजन चले ससुराल' और 'हसीना मान जाएगी' जैसी फिल्मों में गोविंदा ने अपनी कॉमेडी से दर्शकों का मनोरंजन किया।
इन फिल्मों की सफलता ने उनकी पहचान को और मजबूत किया। गोविंदा ऐसे अभिनेता बन गए, जिनकी मौजूदगी फिल्म को एक खास तरह का मनोरंजक अंदाज देती थी।
हालांकि, किसी एक शैली में लगातार सफलता मिलने का दूसरा पहलू भी होता है। दर्शक और फिल्म निर्माता अभिनेता को उसी तरह की भूमिकाओं में देखने के आदी हो सकते हैं। गोविंदा के करियर में भी कॉमेडी उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गई।
गोविंदा के करियर में गिरावट कब शुरू हुई?
2000 के दशक की शुरुआत में गोविंदा के करियर में बदलाव दिखाई देने लगा। उनकी कुछ फिल्मों को पहले जैसी व्यावसायिक सफलता नहीं मिली। फिल्म इंडस्ट्री में नए कलाकारों, नई कहानियों और अलग तरह की फिल्मों का दौर भी आगे बढ़ रहा था।
साल 2003 के आसपास गोविंदा ने कॉमेडी फिल्मों से दूरी बनाने और गंभीर भूमिकाओं की ओर ध्यान देने की बात कही थी। पुराने इंटरव्यू में उन्होंने इस बात पर निराशा जताई थी कि उनकी कॉमेडी फिल्मों को कभी-कभी केवल हल्के मनोरंजन के रूप में देखा जाता था।
यह उनके करियर का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। जिस कॉमेडी ने उन्हें लोकप्रिय बनाया था, उसी शैली से वह कुछ समय के लिए अलग तरह का काम करना चाहते थे।
हालांकि, उनके करियर में आए बदलाव को केवल एक वजह से समझना सही नहीं होगा। फिल्मों की सफलता या असफलता पर कहानी, निर्देशन, दर्शकों की पसंद, रिलीज का समय और फिल्म इंडस्ट्री में हो रहे बदलाव जैसे कई कारक असर डालते हैं।
राजनीति में आने से फिल्मों पर क्या असर पड़ा?
साल 2004 में गोविंदा ने राजनीति में प्रवेश किया और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के टिकट पर मुंबई उत्तर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा। उन्होंने चुनाव जीता और सांसद बने।
संसद में उनकी भूमिका और राजनीतिक जिम्मेदारियों के कारण उनके करियर का एक नया अध्याय शुरू हुआ। इस अवधि में उनकी फिल्मों की रिलीज और अभिनय गतिविधियों में पहले की तुलना में अंतर दिखाई दिया।
हालांकि, राजनीति में आने को ही उनके फिल्मी करियर में गिरावट की एकमात्र वजह मानना उचित नहीं होगा। उस समय उनके फिल्मी करियर में पहले से ही बदलाव हो रहे थे और हिंदी सिनेमा का स्वरूप भी बदल रहा था।
क्या गोविंदा ने फिल्मों में वापसी की कोशिश की?
गोविंदा ने बाद के वर्षों में दोबारा फिल्मों में सक्रियता दिखाई। साल 2006 में रिलीज हुई 'भागम भाग' में वह अक्षय कुमार और परेश रावल जैसे कलाकारों के साथ नजर आए। इसके बाद 2007 में आई 'पार्टनर' में सलमान खान के साथ उनकी जोड़ी को दर्शकों ने पसंद किया।
'पार्टनर' ने गोविंदा को फिर से बड़े पर्दे पर चर्चा में ला दिया। इस फिल्म ने दिखाया कि उनकी कॉमेडी और अभिनय की शैली दर्शकों को अब भी आकर्षित कर सकती है।
इसके बाद भी उन्होंने फिल्मों में काम जारी रखा, लेकिन उन्हें 90 के दशक जैसी लगातार मुख्यधारा की व्यावसायिक सफलता नहीं मिली।
साल 2019 में रिलीज हुई 'रंगीला राजा' उनकी फिल्मों में से एक थी। इसके बाद बड़े पर्दे पर उनकी मौजूदगी सीमित रही। उनके करियर के इस दौर को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि हिंदी सिनेमा में नई पीढ़ी के कलाकारों, नई कहानियों और अलग तरह के मनोरंजन की मांग बढ़ रही थी।
गोविंदा का करियर पहले जैसा क्यों नहीं रहा?
गोविंदा के करियर में आए बदलाव को समझने के लिए कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी है।
पहला, हिंदी सिनेमा की कहानियों और फिल्म निर्माण की शैली समय के साथ बदलती रही। दूसरा, दर्शकों की पसंद में बदलाव आया और नई पीढ़ी के कलाकारों ने अपनी जगह बनाई। तीसरा, गोविंदा की पहचान लंबे समय तक कॉमेडी और मनोरंजक फिल्मों से जुड़ी रही, जबकि वह दूसरे प्रकार की भूमिकाओं में भी काम करना चाहते थे।
इनके अलावा, फिल्मों का चयन, रिलीज का समय और व्यावसायिक प्रदर्शन भी किसी अभिनेता के करियर को प्रभावित करते हैं।
इसलिए यह कहना मुश्किल है कि उनके करियर में बदलाव केवल किसी एक फैसले या घटना की वजह से आया। उपलब्ध फिल्मी इतिहास से इतना जरूर स्पष्ट होता है कि गोविंदा ने सफलता, बदलाव और वापसी के कई दौर देखे।
गोविंदा की कहानी से क्या समझ आता है?
गोविंदा का सफर हिंदी सिनेमा में बदलते समय की एक दिलचस्प मिसाल है। उन्होंने 80 के दशक में अपनी शुरुआत की, 90 के दशक में लोकप्रियता के शिखर तक पहुंचे और बाद में बदलते फिल्मी माहौल में अपनी जगह बनाए रखने की चुनौती का सामना किया।
उनकी फिल्मों के गाने, डायलॉग, डांस और कॉमेडी आज भी कई दर्शकों की यादों का हिस्सा हैं। उनकी कहानी यह भी दिखाती है कि फिल्म इंडस्ट्री में लंबे समय तक सक्रिय रहने के लिए केवल लोकप्रियता ही नहीं, बल्कि बदलते समय के साथ तालमेल बिठाना भी महत्वपूर्ण होता है।
गोविंदा का करियर आज भी हिंदी सिनेमा के उस दौर की याद दिलाता है, जब कॉमेडी, संगीत और मनोरंजन से भरपूर फिल्मों का दर्शकों के बीच खास स्थान था।
आपकी राय क्या है? क्या गोविंदा को आज के दौर की फिल्मों में एक नई तरह की भूमिका के साथ वापसी करनी चाहिए, या उनकी पुरानी कॉमेडी फिल्में ही उनकी सबसे बड़ी पहचान हैं? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।

